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आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं
मेहमाँ ये घर में आएँ तो चुभता नहीं धुआँ

यूँ भी इक बार तो होता कि समुंदर बहता
कोई एहसास तो दरिया की अना का होता

आप के बाद हर घड़ी हम ने
आप के साथ ही गुज़ारी है

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई

आइना देख कर तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई

हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते

ज़मीं सा दूसरा कोई सख़ी कहाँ होगा
ज़रा सा बीज उठा ले तो पेड़ देती है

खुली किताब के सफ़्हे उलटते रहते हैं
हवा चले न चले दिन पलटते रहते है

शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आप की कमी सी है

कल का हर वाक़िआ तुम्हारा था
आज की दास्ताँ हमारी है

काई सी जम गई है आँखों पर
सारा मंज़र हरा सा रहता है

तुझे पहचानूंगा कैसे? तुझे देखा ही नहीं
ढूँढा करता हूं तुम्हें अपने चेहरे में ही कहीं

लोग कहते हैं मेरी आँखें मेरी माँ सी हैं
यूं तो लबरेज़ हैं पानी से मगर प्यासी हैं

बहुत मुश्किल से करता हूँ, तेरी यादों का कारोबार,
मुनाफा कम है, पर गुज़ारा हो ही जाता है

सुनो….ज़रा रास्ता तो बताना.
मोहब्बत के सफ़र से, वापसी है मेरी..

आज हर ख़ामोशी को मिटा देने का मन है
जो भी छिपा रखा है मन में लूटा देने का मन है..

अच्छी किताबें और अच्छे लोग
तुरंत समझ में नहीं आते हैं,
उन्हें पढना पड़ता हैं

मैं दिया हूँ
मेरी दुश्मनी तो सिर्फ अँधेरे से हैं
हवा तो बेवजह ही मेरे खिलाफ हैं

बहुत अंदर तक जला देती हैं,
वो शिकायते जो बया नहीं होती

दर्द - सा झलकता है आपकी आवाज़ में 💔...
जैसे "लफ़्ज़ों" को इससे मायने मिल गए हों "ज़िंदगी" के ❤...😍

मुझको पढ़ पाना हर किसी के लिए मुमकिन नहीं,
मै वो किताब हूँ जिसमे शब्दों की जगह जज्बात लिखे है….!!

कौन कहता हैं कि हम झूठ नहीं बोलते
एक बार खैरियत तो पूछ के देखियें

खूबसूरत होना अच्छा नहीं ही
बल्कि अच्छा होना खूबसूरत है ||

ये ही खासियत है , जिंदगी की ,
कर्ज वो भी चुकाने पड़ते है , जो लिए ही नहीं।

कुछ तो चाहत रही होगी इन बारिश की बूंदों की भी ...
वरना कौन गिरता है इस जमीन पर आसमान तक पहुँचने के बाद ....

रात भर चलती रहती हैं उंगलियां मोबाइल पर
किताब सीने पे रख कर सोए हुए एक ज़माना हो गया.

गुरुर किस बात का करूं मैं
मरने के बाद मेरे अपने ही मुझे छूने के बाद हाथ धोएंगे.

करके हिम्मत धीरे - धीरे जख्मों को सी रहा हूँ,
कल आज से बेहतर होगा इस उम्मीद पर जी रहा हूँ........✍️✍️

उड़ा देती हैं नींदें कुछ जिम्मेदारीयाँ घर की,
रात को जागने वाला हर शख्स आशिक नहीं होता...✍✍✍✍✍

सालों का तजुर्बा तो नहीं मगर दावे से कहता हूँ
अतीत का एक पन्ना ही काफ़ी होता है आँसू बहाने के लिए..✍️

गीली लकड़ी सा इश्क़ है जो उसने सुलगाया है
न पूरा बुझ पाया है न पूरा जल पाया है..✍️

हल्के हल्के बढ़ रही हैं चेहरे की लकीरें,
लग रहा है जैसे
नादानियों और तजुर्बों का बँटवारा हो रहा है..

पसीने की स्याही से लिखे हुए पन्ने कभी कोरे नहीं हुआ करते,
जो करते हैं मेहनत दर मेहनत उनके सपने कभी अधूरे नहीं रहते।

ना खुद पर इतना इतराया कर ए दिल,
उसे तो आदत है बेवजह मुस्कुराने की।

समझने वाले ख़ामोशी भी समझ लेते हैं
न समझने वाले जज़्बातों का भी मज़ाक बना देते हैं

हम भी कभी मुस्कुराया करते,
उजाले में शोर मचाया करते थे,
उस दिए ने मेरे हाथ को जला दिया,
जिस दिए को हम हवा से बचाया करते थे।

Gulzar Shayri